चलो, स्कूल बंद करो – नीति आयोग

नीति आयोग के जरिये सरकार ने यह मंशा जाहिर की है कि वो सरकारी स्कूलों की संख्या कम करेगी I ऐसा करने के लिए नीति आयोग ने एक तर्क दिया है I वो तर्क क्या है? भारत जैसे देश में उस तर्क की सीमाएं क्या हैं? इस लेख में उस तर्क और उसकी सीमाओं पर बात की जाएगी I  

स्कूलिंग के दो मॉडल

इस लेख में स्कूलिंग के दो मॉडल्स का जिक्र बार-बार आएगा I इसलिए शुरू में ही मैं इनके बारे में संक्षेप में समझा देना चाहता हूँ I स्कूलिंग का एक मॉडल पिरामिडल मॉडल है और दूसरा सिलिंडरीकल मॉडल I

पिरामिडल मॉडल का अर्थ यह है कि अगर देश में उपलब्ध सभी स्कूलों को स्तरों के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाये और उन्हें ज्यादा से कम की ओर एक के ऊपर दूसरी श्रेणी को रखा जाये तो हमें एक पिरामिड की आकृति मिलती है I 

इस बात को समझने के लिए आप इस चित्र को देखिए I

इस चित्र के अनुसार भारत में सबसे ज्यादा संख्या प्राइमरी स्कूल्स की है I उससे कम मिडिल स्कूलों की है I जब अलग-अलग स्तर के स्कूलों को इस तरह से प्रदर्शित किया जाता है तो हमें पिरामिड जैसी आकृति मिलती है I 

अगर हर केटेगरी के स्कूलों की संख्या बराबर हो तो हमें सिलिंडर जैसी आकृति मिलती है I इसलिए स्कूलिंग के जिस मॉडल में जितनी संख्या में प्राइमरी स्कूल्स होते हैं लगभग उतनी ही संख्या में मिडल और सेकंड्री स्कूल्स भी होते है उस मॉडल को सिलिंडरीकल मॉडल कहा जाता है I

सिलिंडरीकल मॉडल को समझने के लिए इस चित्र को देखिए –

इस मॉडल में हर स्तर के स्कूलों की संख्या लगभग बराबर है, इसलिए उनकी संख्या को एक के ऊपर एक रखने से हमें एक सिलिंडर की आकृति मिलती है I इसलिए इस मॉडल को स्कूलिंग का सिलिंडरीकल मॉडल कहा जाता है I

नीति आयोग के हवाले से

इन दोनों मॉडल्स की चर्चा नीति आयोग की एक रिपोर्ट के हवाले से की गई है I हालाँकि नीति आयोग ने पाठकों को आगाह किया है कि वे उसके द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट पर भरोसा ना करें I हम उस दौर में पहुँच गये हैं कि एक संस्थान जिसके एक्स ऑफ़िशियो चेयरपर्सन प्रधानमंत्री हैं वो लिख रहा है कि हमारी रिपोर्ट पर भरोसा मत करनाI    

एक संस्थान जिसका नाम है – नेशनल इंस्टीटूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडियाI आम भाषा में इसे नीति आयोग के नाम से जाना जाता है I कुछ महीने पहले इसने भारत में शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य की रुपरेखा के संदर्भ में एक रिपोर्ट जारी की I उस रिपोर्ट का नाम है SCHOOL EDUCATION SYSTEM IN INDIA: Temporal Analysis and Policy Roadmap for Quality Enhancement. इस रिपोर्ट को तैयार करने के दो बड़े उद्देश्य बताये गये हैं I एक 2015 से 2025 के बीच स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में आए अंतर को समझना और दूसरा स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए सिफ़ारिशें करना I 

यह रिपोर्ट, भारत के शैक्षिक परिदृश्य को बदलने के लिए एक रणनीतिक खाका प्रस्तुत करती है, क्योंकि भारत को 2047 तक विकसित भारत बनना है।

आंकड़ों के स्रौत   

यह रिपोर्ट कई राष्ट्रीय डेटासेटों पर आधारित है जो भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली का विस्तृत चित्र प्रस्तुत करते हैं। नामांकन, बुनियादी ढांचा, शिक्षक और प्रबंधन से संबंधित विद्यालय-स्तरीय डेटा यूडीआईएसई + से लिया गया है । लर्निंग आउटकम को समझने के लिए परख और नेशनल अचीवमेंट सर्वे के आंकड़ों का उपयोग किया गया है I लर्निंग आउटकम को व्यापक सामाजिक और घरेलू संदर्भों में समझने के लिए एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट के आंकड़ों का उपयोग किया गया है I

यानि रिपोर्ट तैयार करने के लिए नये/प्राथमिक आंकड़ों नहीं जुटाये गये हैं  I 

व्यवस्थागत और अकादमिक चुनौतियाँ

रिपोर्ट के चौथे अध्याय में स्कूली शिक्षा से संबंधित अनेक व्यवस्थागत और अकादमिक चुनौतियों को चिन्हित किया गया है I रिपोर्ट में 6 प्रकार की व्यवस्थागत चुनौतियों के बारे में बताया गया है। इस लेख में मैं उनमें से केवल एक चुनौती पर बात करूँगा I वह चुनौती है स्कूलिंग के पिरामिडल स्ट्रक्चर को सिलिंडरीकल स्ट्रक्चर में बदल देना I ऐसा करने के लिए बहुत बड़ी संख्या में प्राइमरी स्कूलों को बंद करके मिडिल और सेकेंडरी स्कूलों की संख्या को बढ़ाना होगा I ऐसा करने से शिक्षा के प्रसार और निरंतरता पर सकारात्मक असर पड़ेगा या नकारात्मक यह तो नये स्ट्रक्चर के लागू हो जाने के बाद ही पता चल पायेगा I लेकिन स्कूलिंग के पिरामिडल और सिलिंडरिकल स्ट्रक्चर पर तार्किक बात तो की ही जा सकती है I तार्किक रूप से बात करना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि भारत ने स्कूलिंग के पिरामिडल स्ट्रक्चर को अपनाकर शिक्षा के संख्यात्मक प्रसार में काफी सफलता हासिल की है I   

भारतीय स्कूली शिक्षा-व्यवस्था की आलोचना करते हुए रिपोर्ट में लिखा हुआ है कि हमारी स्कूली-व्यवस्था पिरामिड की तरह है I 

रिपोर्ट की पृष्ठ संख्या 111 पर यह चित्र दिया गया है I

इस चित्र में भारत के अलग-अलग स्तर के स्कूलों की संख्या को एक पिरामिड की शक्ल में दिखाया गया है I पिरामिड के सबसे नीचे प्राइमरी स्कूलों की संख्या दिखाई गयी है I उसके बाद अप्पर प्राइमरी स्कूलों की संख्या दर्ज है, उसके ऊपर सेकेंडरी और सबसे ऊपर हायर सेकण्ड्री स्कूलों की संख्या दिखाई गयी है I देश में सात लाख तीस हज़ार के करीब प्राइमरी स्कूल हैं और एक लाख चौसठ हज़ार के करीब हायर सेकण्ड्री यानि 12वीं तक के स्कूल हैं I 

भारत में केवल 5% स्कूल ऐसे हैं जिनमें कक्षा एक से 12 तक की पढाई होती है I रिपोर्ट का मानना है कि एक स्कूल से दूसरे स्कूल में जाने की प्रक्रिया में अनेक बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं I इसलिए नीति आयोग की इस रिपोर्ट का कहना है कि हमें स्कूलिंग के पिरामिडल स्ट्रक्चर को छोड़कर, सिलिंडरीकल स्ट्रक्चर को अपनाना चाहिए I  

रिपोर्ट के पेज 137 पर यह चित्र दिया हुआ है I

इसमें स्कूलिंग के पिरामिडल और सिलिंडरीकल स्ट्रक्चर की बीच के अंतर को समझाया गया है I इस चित्र में समझाया गया है कि स्कूलिंग के पिरामिडल स्ट्रक्चर में प्राइमरी स्कूल ज्यादा होते हैं और हायर सेकण्ड्री स्कूल कम होते जबकि स्कूलिंग के सिलिंडरीकल स्ट्रक्चर में प्राइमरी से लेकर हायर सेकण्ड्री तक हर स्तर के स्कूलों की संख्या लगभग समान होती है I

स्कूलिंग के सिलिंडरीकल मॉडल के खतरे 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत जैसे देश में जहाँ अलग-अलग भौगोलिक स्थितियां हैं, वहां स्कूलिंग का सिलिंडरीकल स्ट्रक्चर कामयाब होगा या नहीं? स्कूलिंग के पिरामिडल स्ट्रक्चर ने भारत की भौगोलिक विविधताओं को समेटने में काफी अच्छी भूमिका निभाईI 1951 में भारत में औसत साक्षरता दर बहुत कम थीI 2011 में यह बढ़कर करीब 73% हो गयी I 1951 में महिलाओं की औसत साक्षरता दर करीब 9% थी जो 2011 में बढ़कर 65% हो  गयी I

अब एक सवाल यह है कि अगर आजादी के बाद भारत ने स्कूलिंग के लिए पिरामिडल स्ट्रक्चर की जगह सिलिंडरीकल स्ट्रक्चर को अपनाया होता तो क्या भारत अपनी लिटरेसी रेट बढ़ा पाता? इससे अगला सवाल यह है कि अगर आज भारत स्कूलिंग के लिए पिरामिडल स्ट्रक्चर की जगह सिलिंडरीकल स्ट्रक्चर को अपना ले तो इससे आने वाले 10 सालों में भारत की साक्षरता दर पर क्या असर पड़ेगा ? 

नीति आयोग की यह रिपोर्ट कहती है कि हमें प्राथमिक स्कूलों की संख्या कम करनी चाहिए और मिडिल स्कूलों की संख्या बढ़ानी चाहिएI अगर प्राथमिक स्कूल कम किये जाते हैं तो विद्यार्थियों को पढ़ाई करने के लिए अपने घरों से दूर स्थित मिडिल या सेकंड्री स्कूलों तक जाना होगाI दूरी के कारण एक तो बच्चों पर खतरे बढ़ जायेंगे और दूसरा उनके अभिभावकों पर ट्रांसपोर्टेशन कास्ट का भार भी बढ़ेगाI

और दोनों ही कारक बच्चों के स्कूल छोड़ने की सम्भावना को बढ़ा सकते हैं I देश के पहाड़ी इलाकों में गांवों के बीच की दूरी भले ही कम हो, लेकिन प्राइमरी स्तर के लड़के और लड़कियों के लिए एक गाँव से दूसरे गाँव तक पहुंचना कठिन होने के साथ-साथ जोखिम से भरा भी होता है I ऐसे में स्कूलिंग के पिरामिड आकार के स्ट्रक्चर को छोड़कर स्कूलिंग के सिलिंडरीकल स्ट्रक्चर को अपनाने से भारत भले ही कुछ पैसे बचा ले, लेकिन इससे बच्चों की शिक्षा पर बुरा असर पड़ेगा I 

यदि मैं उत्तराखंड जैसे राज्य की बात करूं तो वहां पर जंगली जानवरों के हमलों का खतरा काफी रहता है। इसी तरह के खतरे हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, झारखंड, छत्तीसगढ़, और देश के कई अन्य राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में भी रहते हैं I जंगली जानवरों के हमले के खतरों के अलावा इन राज्यों में नदी-नालों,  लैंडस्लाइड, फिसलन भरे रास्तों आदि के खतरे भी होते हैं I ऐसे में प्राथमिक स्कूलों को कम करवाने का विचार, शिक्षा और बच्चों की सुरक्षा दोनों ही दृष्टियों से घातक हो सकता है I 

या तो रिपोर्ट लिखने वालों और वालियों को उन हालातों की जानकारी नहीं होती जिन हालातों से होकर छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां स्कूल तक पहुँचती हैं या उनके लिए उन बच्चे-बच्चियां का अस्तित्त्व कोई मायने ही नहीं रखता जिन्हें मुश्किल रस्तों और सड़कों से होते हुए स्कूलों तक पहुंचना होता है I 

नीति आयोग चाहता है कि सरकार जंगलों से होकर और उफनती नदी को पार करके स्कूल पहुँचने वाले बच्चों की मुश्किलें और बढ़ा देI क्योंकि सरकार का इरादा शिक्षा पर खर्च को और भी कम करने का है I   

नीति आयोग की यह रिपोर्ट कह रही है कि कम विद्यार्थी वाले स्कूलों को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि ऐसे स्कूलों को चलाना आर्थिक रूप से अप्रभावी और प्रशासनिक तौर पर चुनौतीपूर्ण होता हैI (p. 111) I रिपोर्ट के अनुसार ज्यादा संख्या में प्राइमरी स्कूल्स खोलने की बजाय, कम संख्या में सेकंड्री स्कूल्स खोलने चाहिए I लेकिन इस तरह की सिफारिश करने वालों/वालियों को यह पता न होगा कि भारत के अधिकांश राज्यों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट नाम की कोई चीज है ही नहींI

सेकंड्री स्कूल्स तक पहुँचने के लिए बच्चों को कई-कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता हैI जिस देश में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत बेहद खराब हो उस देश में प्राइमरी स्कूल्स की संख्या कम करने की सिफ़ारिश सीधे-सीधे शिक्षा के अधिकार पर हमला करना हैI 

जिस समय भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर थी उस समय भारत ने स्कूलिंग के पिरामिडल स्ट्रक्चर को अपनाया और बहुत बड़ी संख्या में प्राइमरी स्कूल्स खोले ताकि शिक्षा को बच्चों तक पहुँचाया जा सकेI आज जब भारत की आर्थिक स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर है, उस समय कहा जा रहा है कि जिसे शिक्षित होना है वह स्कूल तक पहुंचेI कैसे पहुंचे? ये पढ़ने की इच्छा रखने वाली लड़की या लड़का जाने! नीति आयोग की रिपोर्ट की सिफ़ारिश का एक अर्थ यह भी निकलता है कि राज्य को पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे सवालों पर विचार नहीं करना चाहिए!    

नीति आयोग की इस रिपोर्ट के पेज 111 पर आंकड़ों की एक टेबल दी गई है I 

इसकी व्याख्या करते हुए नीति आयोग ने लिखा है कि – भारत के बहुत सारे स्कूल ऐसे हैं जहाँ पढ़ने वाले बच्चों की संख्या बहुत ही कम है। उदाहरण के लिए:

  • एक-तिहाई (33% से ज़्यादा) स्कूलों में कुल मिलाकर 50 से भी कम बच्चे हैं।
  • लगभग 5% स्कूल ऐसे हैं जहाँ 10 से भी कम बच्चे पढ़ते हैं।
  • करीब 8% स्कूल ऐसे हैं जहाँ सिर्फ़ 11 से 20 बच्चे ही हैं।

नीति आयोग की सिफारिश है कि इन स्कूलों को बंद करके ऐसे स्कूल खोलने चाहिए जहाँ पर ज्यादा बच्चे पढ़ सकें I लेकिन सवाल तो यही है कि अगर किसी आदिवासी इलाके में गाँव दूर-दूर हैं और हर गाँव में बच्चों की संख्या कम है तो वहां के स्कूलों को बंद करने से आने वाले सालों में ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में भारत की रैंकिंग बढ़ेगी या घटेगी? मेरा मानना है कि स्कूलों को बंद करके भारत की रैंकिंग घटेगीI क्योंकि स्कूलों के दूर हो जाने के कारण अनेक अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगेI क्योंकि अभिभावकों के लिए बच्चों की सुरक्षा प्रमुख चिंता होती है और शिक्षा की चिंता उसके बाद आती हैI 

देश के पहाड़ी राज्यों में एक गाँव से दूसरे गाँव की एरिअल दूरी भले ही कम होती हो लेकिन वास्तविक दूरी बहुत भी होती है और कठिन भी होती है I जब जमीनी हालत इतने खतरनाक हों, तब स्कूलिंग के पिरामिडल स्ट्रक्चर को छोड़कर सिलिंडरीकल स्ट्रक्चर को अपनाना बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ देश के मानव संसाधन के विकास के लिए भी घातक सिद्ध हो सकता हैI  

(बीरेंद्र सिंह रावत का लेख। रावत दिल्ली-विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग से संबद्ध हैं)

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